• प्रधानमंत्री और उनके ज्ञान का दर्जा

    हमें किसी पीएचडी उपाधिधारी प्रधानमंत्री की आवश्यकता नहीं है बल्कि सहानुभूति रखने वाले एक प्रधानमंत्री की आवश्यकता है जो विशेषज्ञों के ज्ञान का मानवीकरण कर सके

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    - जगदीश रत्तनानी

    हमें किसी पीएचडी उपाधिधारी प्रधानमंत्री की आवश्यकता नहीं है बल्कि सहानुभूति रखने वाले एक प्रधानमंत्री की आवश्यकता है जो विशेषज्ञों के ज्ञान का मानवीकरण कर सके, अपने समृद्ध लोकाचार के साथ नागरिकों तथा राष्ट्र की सेवा करे, पृथ्वी और वास्तव में व्यापक ब्रह्मांड की देखभाल कर सके।

    बहुत समय पहले की बात नहीं है कि स्पैम मैसेज और फॉरवर्ड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्वविद्यालय की डिग्रियों की सत्यता के बारे में नहीं बल्कि उनके पूर्ववर्ती और भारत के सबसे शिक्षित प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को दी गई अकादमिक डिग्री और ढेर सारे सम्मानों के बारे में होते थे। उन संदेशों में हमें इस तथ्य को राष्ट्रीय गौरव के रूप में लेने का संदेश दिया कि औपचारिक योग्यता के मामले में डॉ. सिंह के पास उस समय दुनिया के शायद किसी भी अन्य नेता की तुलना में दिखाने के लिए बहुत कुछ था। फिर भी आज यह कहना मुश्किल होगा कि डॉ. सिंह के नेतृत्व ने हमें सुशासन दिया या यह कि जब आवश्यकता थी तो वे खुद खड़े हुए या यहां तक कि बोले भी। यह उनके शासन में व्याप्त कुशासन ही था जिसके कारण कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को सत्ता सौंप दी।

    आज सोशल मीडिया में चल रहे संदेश वर्तमान प्रधानमंत्री की शिक्षा की संदिग्ध कमी के बारे में हैं और सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या भारत के प्रधानमंत्री का औपचारिक रूप से शिक्षित होना आवश्यक है या नहीं। यह उन बीमारियों के लिए गलत गोली होगी जिनका सामना आज देश कर रहा है। निश्चित रूप से यह पूछना उचित होगा कि क्या प्रधानमंत्री और उनकी टीम द्वारा दिखाई गई डिग्रियां वास्तविक हैं। यदि वे वास्तविक नहीं हैं तो उन पर बेईमानी, धोखाधड़ी जैसे आरोप चिपके रहेंगे। उन्हें राजनीतिक और साथ ही कानूनी परिणामों का भी सामना करना होगा। लेकिन यह उस मुद्दे से बहुत अलग मुद्दा है जिसमें कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री को आवश्यक रूप से औपचारिक रूप से शिक्षित होना चाहिए।

    आज के नियमों के मुताबिक भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए विश्वविद्यालय की डिग्री पूर्व-आवश्यकता नहीं है। यह वैसा ही है जैसा कि होना चाहिए। ज्ञान, विशेष रूप से औपचारिक और विशेषज्ञ किस्म का ज्ञान शक्ति से निकटता से जुड़ा हुआ है और यह इंटरलॉक 'विशेषज्ञों' की एक अल्पसंख्यक जमात पैदा करते हुए नियंत्रण करने, आदेश देने और निर्विवाद रूप से बिना कोई जवाब दिए बहुमत को मताधिकार से वंचित कर सकता है। इस प्रकार विकास 'विशेषज्ञ' अपने विचारों, शक्ति और पहुंच के कारण सबसे खराब विकास प्रदान करते हैं। हमारा पर्यावरण संकट आखिरकार विकास विशेषज्ञों की उन्मतत्ता का ही परिणाम है। तथाकथित आर्थिक 'विशेषज्ञों' ने 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की भविष्यवाणी नहीं की थी और संभव है कि उस संकट को बनाने में उनका हाथ हो। इस वित्तीय संकट ने करीब 7 करोड़ 27 लाख रुपये के नए शैक्षणिक भवन के उद्घाटन के समय लंदन स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय को यह पूछने के लिए मजबूर किया कि 'यह (वित्तीय संकट )भयानक है ... किसी ने इसे आते हुए क्यों नहीं देखा?' किसी के पास इसका कोई जवाब नहीं था। मंहगे, रॉकस्टार शैक्षणिक संस्थानों के लिए आज भी पैसे की कोई कमी नहीं है।

    हम यहां विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लोगों के संबंध में बात कर रहे हैं। उनका ज्ञान महत्वपूर्ण है लेकिन यह एकमात्र ज्ञान नहीं है। ज्ञान, विश्वविद्यालय प्रणालियों में ही नहीं बल्कि उसके बाहर स्वदेशी संस्कृति, रीति-रिवाजों, सदियों से विकसित समझ के तरीकों और साधनों में भी रहता है। नवंबर 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन के कार्यकारी कार्यालय के एक ज्ञापन ने 'स्वदेशी पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान (इंडीजेनियस ट्रेडिशनल इकालॉजिकल नॉलेज-आईटीईके) जो स्वदेशी ज्ञान का एक रूप है उसे ज्ञान के कई महत्वपूर्ण निकायों में से एक के रूप में मान्यता दी। यह ज्ञान संयुक्त राज्य अमेरिका की वैज्ञानिक, तकनीकी, सामाजिक और आर्थिक प्रगति तथा प्राकृतिक दुनिया की हमारी सामूहिक समझ में योगदान देता है।'

    भारत में विशेष रूप से व्यापक असमानता को देखते हुए औपचारिक योग्यता पर जोर देने से राजनीतिक पदों को कम विस्तृत बनाया जा सकेगा। यह व्यवस्था के बाहर के लोगों पर नए बोझ को जोड़ेगा। गुजरात से नई दिल्ली शिफ्ट होने के आरंभ से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह कहानी रही है। 2014 में एक साक्षात्कार में उन्हें यह कहते हुए उद्धृत किया गया था: 'मैं एक बाहरी व्यक्ति हूं। मैं वास्तव में खुद को न केवल दिल्ली की राजनीति के लिए बल्कि राजनीति के लिए भी एक बाहरी व्यक्ति मानता हूं। अपने जीवन के 50 वर्षों से मैं सिर्फ उन लोगों के साथ बातचीत कर रहा था जो उनके सामने आने वाली समस्याओं को समझने की कोशिश कर रहे थे। मैं हमेशा देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में, एक राज्य से दूसरे हिस्से में जाते रहता था।' इससे काफी पहले एक साक्षात्कार में उनके हवाले से कहा गया था,'आप यह सुनकर हैरान हो सकते हैं... लेकिन मैं शिक्षित नहीं हूं।'

    हम इस बात से सहमत हो सकते हैं कि आज भारत में हमारे पास एक ऐसा नेता है जो स्पष्ट रूप से 'विशेषज्ञ' के विरोधी है और उनसे कम से कम यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वे विशेषज्ञों के बुने जाल में न फंसे। वे बिना कुछ दिए विशेषज्ञों के सुझावों को सुन सकते हैं।

    'गैर-विशेषज्ञों' को हम एक अलग तरह के ज्ञान, जिज्ञासा, अवलोकन और सुनने की भावना के नजरिए से देखते हैं । यह ज्ञान, पर्यावरण के सम्मान में और 'वसुधैव कुटुम्बकम' के सच्चे अर्थों में - कि दुनिया एक परिवार है के संदर्भ में, जो आम लोगों की वास्तविक जरूरतों पर अधिक आधारित है। इस संदर्भ में सबसे खराब वह गैर-विशेषज्ञ होगा जो विशेषज्ञ होने का नाटक करता है। विशेषज्ञ ज्ञान के बिना विशेषज्ञ स्थिति का दावा करने की इसी इच्छा के कारण जलवायु परिवर्तन की अच्छी तरह से अध्ययन की गई वास्तविकता के खिलाफ निश्चित प्रमाण और सभी शर्मनाक कहानियां इन दिनों उपहास का विषय बनी हुई हैं। 'संपूर्ण राजनीति विज्ञानज् में डिग्री आवश्यक ज्ञान के बिना 'ज्ञान का दिखावा' बनाने की ही श्रेणी में आती है। इस संदर्भ में ट्रम्प और उनके बौद्धिकता विरोधी होने की ओर इशारा करने वाली बराक ओबामा की टिप्पणी उपयुक्त लगती है: ' इस बारे में बेपरवाह होना अच्छा नहीं है कि आप किस बारे में बात कर रहे हैं'। हमारे पास एक ऐसा गैर-विशेषज्ञ है जिसके पास एक विशेषज्ञ के पास होने वाले सारे जाल हैं जैसे कि निश्चितता की भावना- एक दोहरी मार जिसने हमें नोटबंदी, अचानक लगाए गए लॉकडाउन, थालियों को पीटने जैसे बेतुके नीतिगत फैसले दिए हैं जो यह दिखाते हैं कि खाली बर्तन कितना शोर मचा सकते हैं।

    एक शिक्षित प्रधानमंत्री की मांग भाजपा और उसके नेता पर हमला करने का एक अच्छा तरीका है लेकिन विपक्ष (खासतौर पर आप) इस मुद्दे को दरकिनार कर रहा है। मांग एक अधिक मानवीय प्रधानमंत्री की होनी चाहिए जो भविष्य का निर्माण करें,भविष्य की बात सुने, भविष्य की परवाह करे न कि ऐसा व्यक्ति हो जो विरोधी के रूप में देखे जाने वाले हर व्यक्ति पर हमला करने वाला और अधिकारों को कुचलने वाला हो। हमें किसी पीएचडी उपाधिधारी प्रधानमंत्री की आवश्यकता नहीं है बल्कि सहानुभूति रखने वाले एक प्रधानमंत्री की आवश्यकता है जो विशेषज्ञों के ज्ञान का मानवीकरण कर सके, अपने समृद्ध लोकाचार के साथ नागरिकों तथा राष्ट्र की सेवा करे, पृथ्वी और वास्तव में व्यापक ब्रह्मांड की देखभाल कर सके।
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट: दी बिलियन प्रेस)

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